
इस मौके पर परिवार में फसलों की बेहतर पैदावार के लिए खेतों में पूजा किया वही मंदिर वह घरों में सुख समृद्धि के लिए भगवान कुल देवता व कृषि उपकरण नांगर,रापा,कुदारी,बसला हसवा, साबल, हल आदि उपकरणों की पूजा कर उसमें पान सुपारी फूल अक्षत नारियल तथा बंदन लगाकर पूजा की गई प्रसाद के रूप में भगवान पर गुलगुला और मीठा चीला का भोग लगाया गया वहीं सुबह से गाय- बैलों को स्नान करने के बाद उनकी पूजा करते हुए आटे की लोई में नमक डालकर खिलाया गया। समाज में परंपरा है कि इस दिन घर में बने प्रसाद, मिठाई व गुलगुले को लेकर भाई या पिता अपने विवाहित बेटी को तीज में लाने के लिए उनके ससुराल जाते हैं एक मान्यता के अनुसार सावन के दौरान मौसम व मच्छर जनित बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है ऐसे में समाज के लोगों के घरों के दरवाजे पर बैग (ओझा) द्वारा नीम की डाली लगाई गई इसके बदले में ओझा को दान पुण्य किया गया। हरेली के साथ छत्तीसगढ़ी समाज में पारंपरिक त्यौहार भी शुरू हो जाते हैं इसके बाद पोल और तीजा मनाया जाएगा घर से बाहर नीम के पत्ते हुआ दरवाजा पर लगाकर कर बुरी नजर से बचने की कामना की गई महिलाओं ने मिट्टी से बने नंदी बैल की पूजा की। कार्यक्रम में शामिल देवकी साहू, सरिता साहू, हेमा साहू, नीतू साहू, पुष्पा, बेबी ननेश्वरी, मैना देवी, रूपा, शामली, मंजू ठाकुर, सावित्री उपस्थित थे।

