
सरायकेला-खरसावां: जिले के ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में आज भी कई आदिवासी परिवार सुवर्णरेखा नदी की रेत से सोना निकालकर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। वर्षों पुरानी यह परंपरा इन परिवारों के लिए आज भी आजीविका का प्रमुख साधन बनी हुई है। स्थानीय लोगों के अनुसार, सुवर्णरेखा नदी को कभी “सोने की चिड़िया” के नाम से भी जाना जाता था, क्योंकि इसकी रेत में सोने के कण मिलने की मान्यता रही है।
हर सुबह नदी किनारे हाथों में कुदाल, खुरपी और लकड़ी की थाली लेकर पुरुष और महिलाएं पहुंच जाते हैं। वे नदी के किनारे से मिट्टी, रेत और छोटे पत्थरों को निकालकर लकड़ी की थाली में जमा करते हैं। इसके बाद नदी के पानी से उसे बार-बार धोया जाता है। घंटों की मेहनत के बाद रेत में छिपे सोने के महीन कण अलग किए जाते हैं। इन कणों को स्थानीय बाजारों, विशेषकर चांडिल के सोनारों को बेचकर मजदूर प्रतिदिन 300 से 500 रुपये तक की आमदनी कर लेते हैं।
स्थानीय आदिवासियों का कहना है कि उनके परिवार पिछले कई दशकों से यही काम करते आ रहे हैं। रोजगार के अन्य साधनों की कमी और सरकारी योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिलने के कारण वे इसी पारंपरिक कार्य पर निर्भर हैं। कई बार पूरे दिन की मेहनत के बाद केवल 200 से 350 रुपये ही मिल पाते हैं, लेकिन परिवार के भरण-पोषण के लिए यही उनकी आय का मुख्य स्रोत है।
गर्मी, बरसात और ठंड—हर मौसम में यह सिलसिला जारी रहता है। सुबह से शाम तक नदी किनारे मेहनत करने वाले ये परिवार अपने साथ घर से भोजन लेकर आते हैं और दिनभर काम करने के बाद जो भी सोना मिलता है, उसे बेचकर घर लौटते हैं।
ईचागढ़ क्षेत्र के इन आदिवासी परिवारों की स्थिति ग्रामीण रोजगार और स्वरोजगार की चुनौतियों को भी उजागर करती है। अब सवाल यह है कि क्या सरकार इन परिवारों को वैकल्पिक रोजगार और स्वरोजगार योजनाओं से जोड़कर उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर पाएगी। :
