ताड़ का फल ‘तरकुल’ बना ग्रामीणों की कमाई का सहारा, जमशेदपुर के गांवों में बढ़ी मांग

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जमशेदपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों ताड़ के पेड़ों से मिलने वाला मौसमी फल तरकुल लोगों के लिए अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है। गर्मी के मौसम में शरीर को ठंडक पहुंचाने वाले इस फल की शहरों में अच्छी मांग है, जिसका लाभ अब सीधे गांव के लोग उठा रहे हैं।
ग्रामीण सुबह तड़के ताड़ के पेड़ों से ताजा तरकुल तोड़कर जमशेदपुर और आसपास के शहरी बाजारों में बेचने पहुंच रहे हैं। स्थानीय विक्रेताओं के अनुसार एक तरकुल 15 से 20 रुपये तक में बिक रहा है और इसकी खरीदारी के लिए लोगों की अच्छी-खासी भीड़ उमड़ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले बिहार के व्यापारी गांवों से तरकुल खरीदकर शहरों में बेचते थे, लेकिन अब स्थानीय लोग स्वयं बाजार तक पहुंचकर इसकी बिक्री कर रहे हैं। इससे उन्हें पहले की तुलना में अधिक मुनाफा मिल रहा है।
जानकारी के अनुसार तरकुल का सीजन लगभग 15 दिनों तक रहता है। इस अवधि में एक परिवार 12 से 15 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय अर्जित कर लेता है। इससे गांवों में कई परिवारों को मौसमी रोजगार भी उपलब्ध हो रहा है।
झारखंड में ताड़ और खजूर के पेड़ बड़ी संख्या में पाए जाते हैं और यहां की जलवायु इनके विकास के लिए अनुकूल मानी जाती है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि सरकार ताड़ आधारित उत्पादों के प्रसंस्करण और विपणन को बढ़ावा दे, तो यह क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन का माध्यम बन सकता है।
गर्मी के मौसम में बढ़ती मांग और बेहतर बाजार पहुंच के कारण तरकुल अब केवल एक मौसमी फल नहीं, बल्कि ग्रामीणों की आय बढ़ाने का प्रभावी जरिया बनकर उभर रहा है।

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