
आजाद नगर रोड नंबर-15 में आज एक अत्यंत चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण घटना सामने आई। एक गर्भवती महिला अस्पताल से लौट रही थी, तभी ट्रैफिक पुलिस द्वारा उसके वाहन को जांच के लिए रोका गया। वाहन के सभी आवश्यक दस्तावेज मौजूद थे, केवल प्रदूषण प्रमाण पत्र (PUC) की वैधता कुछ दिन पूर्व समाप्त हुई थी। इसके बावजूद उस गर्भवती महिला को भीषण गर्मी और असहनीय धूप में केवल चालान काटने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए खड़ा रखा गया।
एक गर्भवती महिला केवल एक नागरिक नहीं होती, बल्कि आने वाली पीढ़ी की वाहक होती है। ऐसे समय में उसकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान की जिम्मेदारी समाज और प्रशासन दोनों की होती है। यदि चेकिंग के नाम पर उसे चिलचिलाती धूप में खड़ा कर परेशान किया जाए, तो यह केवल एक महिला का नहीं, बल्कि मातृत्व के सम्मान का भी अपमान है। कानून के साथ संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।
प्रश्न यह है कि क्या कानून का पालन करवाने का अर्थ मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह दरकिनार कर देना है?
विडंबना यह है कि जिस राज्य में मुख्यमंत्री महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और कल्याण की बातें बार-बार की जाती हैं, उसी राज्य में यदि गर्भवती महिलाओं को भीषण धूप में खड़ा कर चालान की औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं, तो यह प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
मैं ट्रैफिक डीएसपी नीरज पाठक जी से पूछना चाहता हूं कि क्या यही ट्रैफिक पुलिसिंग का मानक है? क्या व्यवस्था सुधारने का अर्थ केवल चालान काटना और कठोरता दिखाना है, या फिर परिस्थितियों को समझते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाना भी प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है?
हम कानून और यातायात नियमों के पूर्ण समर्थक हैं। लेकिन कानून का उद्देश्य नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करना है, उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान करना नहीं। प्रशासन से अपेक्षा है कि वह विशेष परिस्थितियों में विवेकपूर्ण और मानवीय निर्णय ले तथा गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, मरीजों और जरूरतमंद नागरिकों के साथ संवेदनशील व्यवहार सुनिश्चित करे।